Chapter: 4 अध्याय : ४
Verse Number: 28 छन्द सँख्या : २८
Speaker: Kṛiṣhṇa वक्ता: कृष्ण

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः।।

Transliteration in English

dravya-yajñās tapo-yajñā yoga-yajñās tathāpare swādhyāya-jñāna-yajñāśh cha yatayaḥ sanśhita-vratāḥ

सरल लिप्यंतरण

द्रव्य-यज्ञास्-तपो-यज्ञा योग-यज्ञास्-तथापरे स्व-अध्याय-ज्ञान-यज्ञा-श्-च यतयः संशित-व्रताः

Word Meaning

dravya-yajñāḥ—offering one’s own wealth as sacrifice; tapaḥ-yajñāḥ—offering severe austerities as sacrifice; yoga-yajñāḥ—performance of eight-fold path of yogic practices as sacrifice; tathā—thus; apare—others; swādhyāya—cultivating knowledge by studying the scriptures; jñāna-yajñāḥ—those offer cultivation of transcendental knowledge as sacrifice; cha—also; yatayaḥ—these ascetics; sanśhita-vratāḥ—observing strict vows

शब्दार्थ

द्रव्य-यज्ञाः– अपनी सम्पत्ति का यज्ञ; तपः-यज्ञाः– तपों का यज्ञ; योग-यज्ञाः– अष्टांग योग में यज्ञ; तथा– इस प्रकार; अपरे– अन्य; स्वाध्याय– वेदाध्ययन रूपी यज्ञ; ज्ञान-यज्ञाः– दिव्य ज्ञान की प्रगति हेतु यज्ञ; च– भी; यतयः– प्रबुद्ध पुरुष; संशित-व्रताः– दृढ व्रतधारी |

Translation

Having accepted strict vows, some become enlightened by sacrificing their possessions, and others by performing severe austerities, by practicing the yoga of eightfold mysticism, or by studying the Vedas to advance in transcendental knowledge.

अनुवाद

कठोर व्रत अंगीकार करके कुछ लोग अपनी सम्पत्ति का त्याग करके, कुछ कठिन तपस्या द्वारा, कुछ अष्टांग योगपद्धति के अभ्यास द्वारा अथवा दिव्यज्ञान में उन्नति करने के लिए वेदों के अध्ययन द्वारा प्रबुद्ध बनते हैं |

Purport by H.G. Abhay Charanaravinda Bhaktivedanta Swami Śrīla Prabhupāda

Enlightened souls use self-control and determination, some make sacrifices with things and others offer up their scriptural knowledge.

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद द्वारा व्याख्या

इन यज्ञों के कई वर्ग किये जा सकते हैं | बहुत से लोग विविध प्रकार के दान-पुण्य द्वारा अपनी सम्पत्ति का यजन करते हैं | भारत में धनाढ्य व्यापारी या राजवंशी अनेक प्रकार की धर्मार्थ संस्थाएँ खोल देते हैं – यथा धर्मशाला, अन्न क्षेत्र, अतिथिशाला, अनाथालय तथा विद्यापीठ | अन्य देशों में भी अनेक अस्पताल, बूढों के लिए आश्रम तथा गरीबों को भोजन, शिक्षा तथा चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान करने के दातव्य संस्थान हैं | ये सब दानकर्म द्रव्यमययज्ञ हैं | अन्य लोग जीवन में उन्नति करने अथवा उच्च्लोकों में जाने के लिए चान्द्रायण तथा चातुर्मास्य जैसे विविध तप करते हैं | इन विधियों के अन्तर्गत कतिपय कठोर नियमों के अधीन कठिन व्रत करने होते हैं | उदाहरणार्थ, चातुर्मास्य व्रत रखने वाला वर्ष के चार मासों (जुलाई से अक्टूबर तक) बाल नहीं कटाता, न ही कतिपय खाद्य वस्तुएँ खाता है और न दिन में दो बार खाता है, न निवास-स्थान छोड़कर कहीं जाता है | जीवन के सुखों का ऐसा परित्याग तपोमययज्ञ कहलाता है | कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अनेक योगपद्धतियों का अनुसरण करते हैं तथा पतंजलि पद्धति (ब्रह्म में तदाकार होने के लिए) अथवा हठयोग या अष्टांगयोग (विशेष सिद्धियों के लिए) | कुछ लोग समस्त तीर्थस्थानों की यात्रा करते हैं | ये सारे अनुष्ठान योग-यज्ञ कहलाते हैं, जो भौतिक जगत् में किसी सिद्धि विशेष के लिए किये जाते हैं | कुछ लोग ऐसे हैं जो विभिन्न वैदिक साहित्य तथा उपनिषद् तथा वेदान्तसूत्र या सांख्यादर्शन के अध्ययन में अपना ध्यान लगाते हैं | इसे स्वाध्याययज्ञ कहा जाता है | ये सारे योगी विभिन्न प्रकार के यज्ञों में लगे रहते हैं और उच्चजीवन की तलाश में रहते हैं | किन्तु कृष्णभावनामृत इनसे पृथक् है क्योंकि यह परमेश्र्वर की प्रत्यक्ष सेवा है | इसे उपर्युक्त किसी भी यज्ञ से प्राप्त नहीं किया जा सकता, अपितु भगवान् तथा उनके प्रामाणिक भक्तों की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है | फलतः कृष्णभावनामृत दिव्य है |

Notes By Kunal Gautam

प्रबुद्ध आत्माएं आत्म-नियंत्रित और दृढ़ संकल्प का उपयोग करती हैं, कुछ वस्तुओं से यज्ञ करते हैं और अन्य अपने शास्त्र ज्ञान का अर्पण करते हैं।

कुणाल गौतम द्वारा टिप्पणी