| Chapter: 2 | अध्याय : २ |
| Verse Number: 40 | छन्द सँख्या : ४० |
| Speaker: Kṛiṣhṇa | वक्ता: कृष्ण |
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।
Translation
In this endeavor there is no loss or diminution, and a little advancement on this path can protect one from the most dangerous type of fear.
अनुवाद
इस प्रयास में न तो हानि होती है न ही ह्रास अपितु इस पथ पर की गई अल्प प्रगति भी महान भय से रक्षा कर सकती है |
Read More | और पढ़े