| Chapter: 4 | अध्याय : ४ |
| Verse Number: 16 | छन्द सँख्या : १६ |
| Speaker: Kṛiṣhṇa | वक्ता: कृष्ण |
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।
Translation
Even the intelligent are bewildered in determining what is action and what is inaction. Now I shall explain to you what action is, knowing which you shall be liberated from all misfortune.
अनुवाद
कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इसे निश्चित करने में बुद्धिमान् व्यक्ति भी मोहग्रस्त हो जाते हैं | अतएव मैं तुमको बताऊँगा कि कर्म क्या है, जिसे जानकर तुम सारे अशुभ से मुक्त हो सकोगे |
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